कबीर परमात्मा कि लिलाए

जब द्रोपती जी अविवाहित थी उस समय वह अपनी नोकरानीयो के साथ नदी पर स्नान करने गयी थी | वहा एक अन्धा महात्मा स्नान कर रहा था वह महात्मा लड़कियो कि आवाज सुन कर गहरे पानी मे चला गया |द्रोपती जी ने देखा कि महात्मा जी स्नान कर रहै है बाहर आएगे तो ज्ञान चर्चा करेगे तब तक हम भु स्नान कर लेगे  जब द्रोपती जी ने स्नान कर लिया और देखा कि महात्मा जी अभी तक नदी मे ही खड़े हो तो द्रोपती जी ने ध्यान से देखा तो ऐसा लगा कि महात्मा जी पानी मे कुछ खोज रहे है तब द्रोपती समझ गई कि महात्मा जी के पास कपड़ा नही है जिसे पहन कर वह नदी से बाहर आ सके तब द्रोपती जी ने अपनी साड़ी का कुछ हिस्सा काट कर जिस तरफ पानी बह रहा था वहा पानी मे छोड़ दिया ऐसे 6-7 बार कपड़ा महात्मा जी के हाथ कपड़ा नही लगा फिर द्रोपती जी ने जगल से लम्बी लकड़ी उठाई उस लकडी़ के सहारे वह कपड़ा महात्मा जी के पास कर दिया महात्मा जी ने वह कपड़ा पकड़ लिया और परमात्मा का धन्यवाद किया 
जब द्रोपती जी विवाह के पश्चात ससुराल चली गयी थी  पांडवो ने एक शिश महल बनाया था उस समय दुसाशन को भी आमन्त्रित किया था दुसाशन शिश महल नही देख पाया ओर उस से टकरा गया उस समय द्रोपती जी ने अपने देवर दुसाशन से हंसी मजाक मे कहा कि अन्धो कि संतान अन्धी ही होती है दुसाशन इस बात का बुरा मान गया और द्रोपती जी से प्रशोध कि भावना रखने लगा कुछ समय पश्चात पाड़वो ने द्रोपती जी को जुए मे हार गये 
उस समय दुसाशन ने कहा कि द्रोपती जी को सभा मे लेकर आओ  उसे सभा मे नग्न किया जाएगा हम तो अन्धे कि संतान है हमे कुछ दिखाई नही देता 
जब द्रोपती जी को सभी मे लाया गया जब द्रोपती जी ने पाड़ वो कि तरफ देखा तो पाड़वो ने ही गर्दन निचे कर ली भिष्मपिमा, द्रोणाचार्य, कर्ण जैसे योध्दाओ से प्रार्थना कि उस यह अपमान मत करो उस समय सभी कि गर्दन निचे को झुक गयी उस समय द्रोपती जी ने अपने गुरु कृष्ण जी को याद किया उस समय श्रीकृष्ण रुप मे स्वयं परमात्मा कृष्ण रुप मे आकर द्रोपती जी कि साड़ी बढाई थी 

कहा जाता है कि दुसाशन मे 1000 साथीयो कि शक्ति थी फिर भी दुसाशन से साड़ी समाप्त नहीं हुई थी दुसाशन जैसे योध्दा को भी पसीना 💧आ गया था


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